अल्सरेटिव कोलाइटिस क्या है? कारण, लक्षण और 100% प्राकृतिक आयुर्वेदिक उपचार
कल्पना कीजिए कि आपकी रक्षा करने वाला सिपाही ही अचानक आपकी दीवारों को गिराने लगे। कुछ ऐसा ही होता है एक खास स्वप्रतिरक्षित रोग में – अल्सरेटिव कोलाइटिस में। यह रोग शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा बड़ी आंत (कोलन) और मलाशय (रेक्टम) की आंतरिक परत पर हमला करने से होता है। इस रोग में आंतों की परत में सूजन आ जाती है, जिससे उसमें घाव (अल्सर) बनने लगते हैं। यह रोग सिर्फ शारीरिक नहीं, मानसिक स्तर पर भी व्यक्ति को प्रभावित करता है। तनाव, चिंता और जीवनशैली की अनियमितताएं इसकी गंभीरता को बढ़ा सकती हैं। आयुर्वेद इसे ‘पित्तज ग्रहणी’ या ‘रक्तातिसार’ के रूप में देखता है और उपचार में शरीर की अग्नि को सुधारने, दोषों का संतुलन बनाने और मन को शांत रखने पर बल देता है।
अल्सरेटिव कोलाइटिस के कारण
अल्सरेटिव कोलाइटिस के सटीक कारण अभी पूरी तरह ज्ञात नहीं हैं, लेकिन कई कारक इस रोग के उत्पन्न होने में भूमिका निभाते हैं:
- प्रतिरक्षा प्रणाली का असंतुलन – जब शरीर की इम्यून सिस्टम किसी संक्रमण से लड़ते समय गलती से बड़ी आंत की स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला करने लगती है।
- आनुवंशिकता – यदि परिवार में किसी को यह बीमारी रही हो, तो इसकी संभावना बढ़ जाती है।
- पर्यावरणीय कारण – प्रदूषण, संक्रमण, कुछ बैक्टीरिया या वायरस, अस्वच्छ भोजन आदि ट्रिगर की तरह कार्य कर सकते हैं।
- खानपान और जीवनशैली – मसालेदार भोजन, अधिक मांसाहार, तली-भुनी चीज़ें, धूम्रपान, और अत्यधिक शराब इसका खतरा बढ़ा सकते हैं।
- तनाव – मानसिक तनाव सीधे रोग का कारण नहीं बनता, लेकिन इसकी स्थिति को और खराब कर सकता है।
- आयु और लिंग – यह रोग किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन युवावस्था से मध्य आयु तक अधिक सामान्य है। पुरुषों और महिलाओं में इसकी संभावना लगभग समान होती है।
अल्सरेटिव कोलाइटिस के लक्षण
अल्सरेटिव कोलाइटिस एक पुरानी आंतों की सूजन संबंधी बीमारी है, जिसके लक्षण समय-समय पर हल्के या तीव्र रूप में उभर सकते हैं। इसके प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं:
- बार-बार दस्त
- मल में रक्त या श्लेष्मा
- पेट दर्द और मरोड़
- वजन में कमी
- थकान और कमजोरी
- बुखार
- भूख में कमी
- एनीमिया
अल्सरेटिव कोलाइटिस का आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
आयुर्वेद में अल्सरेटिव कोलाइटिस को मुख्यतः पित्तज ग्रहणी या रक्तातिसार माना जाता है, जिसमें पित्त और वात दोषों की वृद्धि से आंतों की जठराग्नि दुर्बल हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप आंतों की परत में सूजन, जलन और रक्तस्राव होने लगता है। दुष्ट पित्त और रक्त मिलकर मल के साथ बाहर निकलते हैं। मानसिक तनाव, तामसिक भोजन, अनियमित दिनचर्या और कमजोर पाचन इस रोग को बढ़ाते हैं। आयुर्वेद में उपचार का उद्देश्य अग्नि को सुधारना, दोषों का संतुलन करना और आंतों को संबल देना होता है, जिसमें हर्बल दवाएं, पंचकर्म, सात्त्विक आहार और मानसिक शांति पर बल दिया जाता है।
अल्सरेटिव कोलाइटिस के लिए प्लैनेट आयुर्वेदा की हर्बल औषधियाँ
प्लैनेट आयुर्वेदा इस पवित्र विज्ञान को एक आधुनिक रूप देता है— बिना रसायन, बिना मिलावट, केवल शुद्धता और शांति के साथ। इसके कुटज, अर्जुन, गिलोय, नागरमोथा और मुक्तापिष्टी जैसे जड़ी-बूटियां शरीर में वह संदेश देती हैं जिसे आधुनिक चिकित्सा अक्सर अनसुना कर देती है— “मैं तुम्हारे शरीर को सुनता हूँ, और उसे ठीक करना चाहता हूँ, बिना किसी आक्रमण के।” हर कैप्सूल, हर चूर्ण एक मंत्र की तरह है— जो पाचन अग्नि को प्रज्वलित करता है, दोषों को संतुलित करता है, और आंतों की अंदरूनी परतों को फिर से नवजीवन देता है।
अल्सरेटिव कोलाइटिस के लिए हर्बल औषधियाँ
1. अर्जुन कैप्सूल
अर्जुन की मानकीकृत अर्क से बने ये कैप्सूल पित्त दोष को संतुलित कर अत्यधिक रक्तस्राव को नियंत्रित करते हैं। इसमें थकानहर और तृष्णाहर गुण होते हैं, जो थकावट व निर्जलीकरण को कम करते हैं।
सेवन विधि: भोजन के बाद दिन में दो बार, 2 कैप्सूल गुनगुने पानी के साथ।
2. पित्त बैलेंस कैप्सूल
गिलोय सत्व और मुक्तापिष्टी जैसे शीतल तत्वों से युक्त ये कैप्सूल पाचन तंत्र को सहयोग देते हैं, सूजन घटाते हैं और आंतों को सुरक्षित रखते हैं।
सेवन विधि: भोजन के बाद दिन में दो बार, 2 कैप्सूल गुनगुने पानी के साथ।
3. वत्सकादि चूर्ण
बिल्व, कुटज, धनिया, नागरमोथा आदि जड़ी-बूटियों से बना यह चूर्ण पाचन अग्नि को संतुलित करता है और दस्त व सूजन में राहत देता है।
सेवन विधि: 1 चम्मच चूर्ण दिन में दो बार, भोजन के बाद गुनगुने पानी से लें या काढ़ा बनाकर पिएं।
4. कुटजघन वटी
कुटज युक्त यह वटी आंतों की सूजन को शांत करती है और दस्त, ऐंठन में राहत देती है। इसमें एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं।
सेवन विधि: भोजन के बाद दिन में दो बार, 2 टैबलेट्स गुनगुने पानी के साथ।
अल्सरेटिव कोलाइटिस एक युद्ध है – खुद के ही शरीर से, लेकिन सही मार्गदर्शन, पौष्टिक आहार, आयुर्वेदिक चिकित्सा और सकारात्मक सोच से यह युद्ध जीता जा सकता है।




